क्या किया जाए जब बुद्धि ही भ्रष्ट हो जब आप ही नहीं सही तो अपेक्षा सही दूसरों से कैसे
जब एक ही नहीं सब ही त्रस्त हो क्या किया जाए जब बुद्धि ही भ्रष्ट हो कुछ न करो बस वही करो जिसमें सब मस्त हों
क्या किया जाए जब बुद्धि ही भ्रष्ट हो
कुछ न करो जो सब करें
वही आप भी करो सब खुश आप खुश
सभी नतमस्त हो क्या किया जाए
जब बुद्धि ही भ्रष्ट हो वही करो जिसमें सब मस्त हो
“ललित उपाध्याय” अकेला की कलम से
