वर्दी का धर्म सिर्फ संविधान – सुप्रीम कोर्ट की सख्त चेतावनी 

वर्दी का धर्म सिर्फ संविधान – सुप्रीम कोर्ट की सख्त चेतावनी 

“यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि जब पुलिस बल के सदस्य अपनी वर्दी पहनते हैं, तो उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अपने व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों और प्रवृत्तियों को त्याग दें, चाहे वे धार्मिक, नस्लीय, जातिवादी या अन्य हों। उन्हें अपने पद और वर्दी से जुड़े कर्तव्य के प्रति पूर्ण और समग्र निष्ठा के साथ सच्चे रहना चाहिए। दुर्भाग्य से, इस मामले में ऐसा नहीं हुआ।” — सुप्रीम कोर्ट।

भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में न्यायपालिका बार-बार इस बात को दोहराती रही है कि कानून और व्यवस्था बनाए रखने वाली एजेंसियों का दायित्व निष्पक्ष और ईमानदार रहना है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के अकोला दंगा मामले में पुलिस के आचरण पर कठोर टिप्पणी की। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब कोई पुलिसकर्मी वर्दी पहनता है, तो वह अपनी व्यक्तिगत पहचान और पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर केवल संविधान और कानून के प्रति उत्तरदायी होता है। अदालत की यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे पुलिस तंत्र के लिए चेतावनी और मार्गदर्शन है। महाराष्ट्र के अकोला जिले में हुए दंगे और हिंसा की घटनाओं के बाद कई गंभीर आरोप सामने आए। पीड़ित पक्ष ने आरोप लगाया कि स्थानीय पुलिस ने मामले की निष्पक्ष जांच करने के बजाय पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया। इससे न केवल न्याय की प्रक्रिया प्रभावित हुई बल्कि पुलिस की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हो गए। इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गहरी नाराज़गी व्यक्त करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि एक विशेष जांच दल गठित किया जाए और यह भी सुनिश्चित किया कि उसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल किया जाए ताकि किसी भी तरह का पूर्वाग्रह या पक्षपात न झलके। अदालत ने यह कदम इसलिए उठाया क्योंकि यह ज़रूरी था कि जांच न केवल निष्पक्ष हो बल्कि निष्पक्ष होते हुए दिखाई भी दे।

न्यायालय की यह टिप्पणी पुलिस व्यवस्था और लोकतंत्र के लिए गहरा संदेश देती है। अदालत ने साफ कहा कि वर्दी पहनने के बाद पुलिसकर्मी को अपनी धार्मिक, जातिगत या व्यक्तिगत प्रवृत्तियों से ऊपर उठना होगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस को एक तटस्थ संस्था माना जाता है, जिसका एकमात्र उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना और नागरिकों की रक्षा करना है। अगर पुलिस स्वयं पूर्वाग्रहों से प्रभावित होकर कार्य करेगी, तो जनता का भरोसा खत्म हो जाएगा। लोकतंत्र की सफलता काफी हद तक पुलिस और प्रशासन की निष्पक्षता पर निर्भर करती है। जनता पुलिस को न्याय और सुरक्षा का प्रतीक मानती है, लेकिन यदि पुलिस पक्षपाती हो जाए तो यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। गाज़ीपुर जनपद की हालिया घटना इस चेतावनी का जीता-जागता उदाहरण है। नोन्हारा थाना क्षेत्र में बिजली खंभा लगाने की मांग को लेकर स्थानीय लोग धरने पर बैठे थे। आरोप है कि पुलिस ने थाने की बत्तियाँ बुझाकर अंधेरे में प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया। इस दौरान भाजपा कार्यकर्ता सियाराम उपाध्याय (उर्फ जोखू) गंभीर रूप से घायल हो गए और बाद में उनकी मौत हो गई। घटना के बाद थाना प्रभारी समेत छह पुलिसकर्मियों को निलंबित व 6 को लाइन हाजिर किया गया साथ ही मजिस्ट्रेटी जांच बैठाई गई, लेकिन जनता के मन में यह सवाल बना रहा कि क्या पुलिस ने अपने अधिकार का दुरुपयोग किया और राजनीतिक दबाव में काम किया। यह स्थिति सुप्रीम कोर्ट की उसी चेतावनी को पुष्ट करती है कि वर्दी पहनने वाला अधिकारी केवल संविधान और कानून के प्रति जवाबदेह है, न कि किसी सत्ता, समुदाय या समूह के प्रति। लोकतांत्रिक विरोध और असहमति को बल प्रयोग से दबाने की कोशिश जब होती है, तो जनता का विश्वास टूटता है और पुलिस की विश्वसनीयता पर गहरे प्रश्न खड़े होते हैं। इतिहास गवाह है कि पूर्वाग्रहों और पक्षपात ने कई बार कानून व्यवस्था को गहरी चोट पहुँचाई है। 1987 का हाशिमपुरा कांड इसका ज्वलंत उदाहरण है, जिसमें पीएसी के जवानों पर मुस्लिम युवकों की हत्या का आरोप लगा। इसी तरह 1984 के सिख विरोधी दंगों में भी पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे। इन घटनाओं ने पुलिस पर से जनता का भरोसा हिलाया और यह साबित किया कि जब पुलिस निष्पक्षता छोड़ देती है, तो लोकतंत्र कमजोर हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी और गाज़ीपुर की त्रासदी इन्हीं ऐतिहासिक सच्चाइयों की याद दिलाती है।

दरअसल यह मामला एक बार फिर पुलिस सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करता है। 2006 में प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधारों के लिए कई अहम दिशानिर्देश दिए थे। इनमें पुलिस की स्वायत्तता, एक स्वतंत्र पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन और अधिकारियों की मनमानी तबादलों पर रोक जैसे सुझाव शामिल थे। लेकिन इन सुधारों पर राज्यों ने ढिलाई दिखाई। आज भी पुलिस व्यवस्था कई बार राजनीतिक और सामाजिक दबाव में काम करती है। गाज़ीपुर की घटना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सुधारों को लागू करने में देरी लोकतंत्र और न्याय दोनों के लिए खतरनाक हो सकती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट भी बताती है कि पुलिस के खिलाफ शिकायतों और उत्पीड़न के मामले लगातार सामने आते हैं। वहीं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी कई बार पुलिस की कार्यप्रणाली पर चिंता जताई है। इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि जनता का भरोसा कायम रखने के लिए पुलिस को निष्पक्षता और पारदर्शिता की ओर और ठोस कदम उठाने होंगे।

पुलिस बल का सबसे बड़ा हथियार जनता का विश्वास है। जब जनता को विश्वास होगा कि पुलिस निष्पक्ष और न्यायसंगत है, तो वह सहयोग भी करेगी। लेकिन जब पुलिस पर पक्षपात के आरोप लगते हैं, तो यह भरोसा डगमगा जाता है। सुप्रीम कोर्ट की यह सख्त टिप्पणी दरअसल जनता के उसी भरोसे को बचाने की कोशिश है। चाहे अकोला हो या गाज़ीपुर — हर घटना यही चेतावनी देती है कि लोकतंत्र तभी सशक्त बनेगा जब पुलिस अपने कर्तव्यों का निर्वहन बिना किसी पूर्वाग्रह और दबाव के करेगी। वर्दी पहनते ही व्यक्तिगत पहचान पीछे छूट जानी चाहिए और केवल संविधान तथा कानून ही मार्गदर्शक बनने चाहिए। यही लोकतंत्र की सफलता की कुंजी है।

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